इस्लामाबाद: पाकिस्तान के पेशावर से सामने आई एक रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के साथ भारी भेदभाव की खबरों की पुष्टि हो जाती है। इस मुल्क में अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर ईसाइयों को मरने के बाद भी कब्र के लिए सम्मानजनक जगह नहीं मिल पाई है। 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' रिपोर्ट के मुताबिक, कब्रिस्तानों में जगह की भारी कमी के कारण लोगों के लिए अंतिम संस्कार एक बड़ी परेशानी बन गया है। कॉलेज लेक्चरर इमरान यूसुफ मसीह ने बताया कि कई परिवारों को मजबूरी में अपने प्रियजनों को भीड़भाड़ वाले कब्रिस्तानों में दफनाना पड़ रहा है या फिर पुरानी कब्रों को दोबारा इस्तेमाल करना पड़ता है।
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'कब्रों से निकालनी पड़ रही हैं पुरानी लाशें'
ईसाई समुदाय के लोगों के मुतबिक, हालात इतने खराब हैं कि कई जगह पुराने शवों को निकालकर नई लाशों को दफनाने के लिए जगह बनाई जा रही है। इससे न सिर्फ लोगों को मानसिक दुख होता है, बल्कि परिवारों के बीच विवाद भी बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जमीन माफिया द्वारा कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा करने से समस्या और गंभीर हो गई है। गोरा, वजीर बाग, कोहाटी और नौथिया जैसे ऐतिहासिक कब्रिस्तान, जो 1947 से पहले बनाए गए थे, आज की बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त नहीं हैं और पहले ही अपनी क्षमता से ज्यादा भर चुके हैं।
'इज्जत के साथ अंतिम विदाई भी नसीब नहीं'
सरकारी कर्मचारी जुल्फिकार मसीह ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों को बराबरी का नागरिक होने के बावजूद बुनियादी अधिकार, जैसे इज्जत के साथ अंतिम विदाई भी नसीब नहीं हो पा रही है। इस तरह की समस्या केवल ईसाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंदू और सिख समुदाय भी इससे प्रभावित हैं। हालांकि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेतृत्व वाली राज्य सरकार सहित कइयों ने इस मुद्दे को हल करने के वादे किए हैं, लेकिन जमीन पर कोई ठोस काम नजर नहीं आता।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी 3.3%
2023 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी 3.3% है, जो पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा, इस्लामाबाद और बलूचिस्तान में रहती है। इसके बावजूद, सामाजिक कार्यकर्ता हारून सरबद्याल का कहना है कि अल्पसंख्यकों के कब्रिस्तानों के लिए जो फंड दिए गए, उनका कोई ठोस नतीजा अब तक सामने नहीं आया है। उन्होंने यह भी कहा कि दूर-दराज के इलाकों में कब्रिस्तान के लिए जमीन देने का प्रस्ताव व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि इससे लोगों को वहां पहुंचने में कठिनाई होगी और सुरक्षा संबंधी खतरे भी बढ़ेंगे।
सरकार में अस्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्य शून्य
खैबर पख्तूनख्वा सरकार में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व न होना समस्या को और गंभीर बनाता है। यही वजह है कि अल्पसंख्यकों की आवाज सीधे सरकार तक नहीं पहुंच पा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस मुद्दे पर सरकारी अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। रिपोर्ट में यह साफ नजर आ रहा है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को आज भी बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, और मौत के बाद भी उन्हें वाजिब इज्जत नहीं मिल रही है।